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डेंगू

जिसका सही नाम डेंगी है, एक विषाणु डेन – 1, 2, व 3 से फैलता है जो एक मच्छर एडीस (Tiger Mosquito) से फैलता है यह मच्छर छोटे पानी के स्थान पर रहता व प्रजनन करता है जैसे गमले का पानी, कूलर का पानी, नाली का पानी, कुड़े घर के पास पानी का स्रोत। इस बुखार में बदन दर्द, तेज बुखार, शरीर पे चकत्ते, हड्डीयों में दर्द । इसलिए इसे हड्डी तोड़ बुखार (Breakbone Fever) भी कहते है यह बुखार 90% मरीजों खूब तरल पदार्थ पीने से व आराम करने से ठीक हो जाता है, बस थोड़ी सावधानी के लिये Platelet count कराने पड़ते है जो 30,000 cells/cmm से ज्यादा होने चाहिये।
अगर Platelet count 30,000 cells/cmm से कम है, काला पखाना हो रहा है या नाक कान या कही से खून आ रहा है तब Indoor भर्ती की  जरुरत है । बच्चो में तेज पेट दर्द, उल्टी में भी Indoor भर्ती की जरुरत है व मरीज ठीक हो जाते है इसलिए घबराये नही व एक Qualified Doctor को दिखायें व सही Pathology Lab में Pathologist द्वारा  Test करायें व स्वस्थ हो जायें ।

कहने का तात्पर्य यह है की डेंगू एक बोहत साधारण बीमारी है| इसमे डेंगू टेस्ट की कोई आवश्यता नहीं है अर्थात जब भी डेंगू जैसे लक्षण होवे या बुखार आये तो आप अपने घर में आराम करे और खूब तरल पदार्थ ले, तुलसी की चाय,नीबू का पानी या साधारण पानी ले, और किसी विशेष प्रकार की जांच से बचे, अगर ज्यादा तकलीफ है या बुखार ज्यादा है तो Platelet count  कराया जा सकता है और उसको फॉलो किया जा सकता है, अगर Platelet count काउंट ३०००० से कम है और शरीर के किसी भाग से खून आ रहा है या काले रंग का पखाना हो रहा है या आंतो में खून उतर रहा है, तभी डेंगू की स्पेसिफिक जांच जिसको एलाइजा and R .T .P .C .R. एवं  RAPID Chromatography विधि से कराने की जरूरत है अन्यथा किसी भी केस में स्पेसिफिक जांच करने की जरूरत नहीं है|

स्वाइन फ्लू :

जैसा कि हम सब जानते है, स्वाइन फ्लू एक विषाणु H1N1 से होता है। ‘H’ और ‘N’ शब्द वास्तव  में विषाणु के हथियार को प्रदर्शित करते है, जिससे विषाणु/वायरस संक्रमण फैलाता है। ‘H’  शब्द ‘होमाग्लूटिनिन ’ को प्रदर्शित करता है। जिसकी सहायता से विषाणु/वायरस मेजबान कोशिका के संवेदागों (Receptors) से जुड़ कर रोग उत्पन्न करता है और ‘N’  शब्द न्यूरामिनिडेज को प्रदर्शित करता है जो कोशिका के खोल(Exit Point) को तोड़कर संक्रमण एक कोशिका से दूसरी में  फैलाता है।
सामान्यतया मानव शरीर विषाणु के ‘H’ और ’N’ एण्टीजन के विरुध्द एण्टीबाडी उत्पन्न करते हैं। ‘H’ एण्टीजन द्वारा उत्पन्न एण्टीबॉडी मनुष्य में रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करता है, जबकि ‘N’  एण्टिजन द्वारा उत्पन्न एण्टीबॉडी संक्रमण को फैलने से रोकता है। H1N1 विषाणु का संक्रमण हवा (Aerosol) के माध्यम से फैलता है। (जैसे – खाँसी , छीक, थूक) व्यक्ति की वस्तुएँ (जैसे, तौलिया, रुमाल इत्यादि) इस्तेमाल करने से फैलता है।स्वाइन फ्लू से लड़ने में हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। श्वसन तंत्र के नाक एवं अन्य भागों में स्थित कोशिकाओं द्वारा एण्टीबॉडी ‘IgA’ का स्रावण होता है जो संक्रमण से लड़ती है। मानव शरीर की कुछ अन्य क्रिया विधियाँ जैसे कोशिकीय सफेद रक्त कणिकाएँ (विषाणु को खाने वाली कोशिकाएँ) एवं इन्टरफेरॉन (विशेष प्रकार की ग्लाइको प्रटीन जो रोग प्रतिरोधक तंत्र व्दारा उत्पन्न होती है) संक्रमण को रोकने में महत्वपर्ण भूमिका निभाते हैं और स्वाइन फ्लू के ज्दातर मामलों को एक सप्ताह में ठीक कर देते हैं।
हालॉकि इन्फ़ल्युऍन्जा (संक्रामक शीत ज्वर) का धमाका बहुत ही सामान्य है और प्रतिवर्ष पाया जाता है। इसलिए स्वाइन फ्लू का इतना आतंक थोड़ा अजीब लगता है। जैसा कि पिछले 10 - 15 वर्षों में H1N1 विषाणु का संक्रमण विश्व स्तर पर व्यापक और सामान्य ही रहा है। स्वाइन फ्लू के मुख्य लक्षण है, खॉसी गले में खराश शरीर में दर्द (मुख्यतया पीठ में दर्द), सरदर्द (माथे पर), बोखार, ठण्ड और कपकपी आना, सॉस लेने में कष्ट होना इत्यादि है। सामान्यतया स्वाइन फ्लू के साधारण मामलों में अधिकांश मरीज 2 – 7 दिनों में साधारण दवाओं से ही ठीक हो जाते है, जैसे कि एसीटाएमीनोफेन (Acetanimaphen) जो बुखार एवं दर्द से राहत दिलाती है, हॉलाकि खॉसी के लिए किसी खास दवा की आवश्यकता नहीं है क्योंकि H1N1 से उत्पन्न होने वाली खॉसी स्वतः ठीक हो जाती है। कुछ ख़ास महॅगी एण्टीवाइरल दवाऍ जैसे कि Osceltamivir  जो 75mg दिन में दो बार पाँच दिनों तक दी जाती हैं, जिसका स्वाइन फ्लू के उपचार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है। ये दवायें व्यक्ति को 1 – 1.5 दिन पहले ठीक करती है, उन व्यक्तियों की अपेक्षा जो ऐसी महॅगी दवाएं नहीं लेते हैं अथवा Placebo (ऐसी दवाऍ जो मरीज की संतुष्टि के लिए दी जाती है उपचार हेतु नहीं) लेते हैं। अतः ऐसी महॅगी दवाओं का हौआ बनाना थोड़ा विचित्र लगता है। यद्पि H1N1 से उतेपन्न समस्याएँ जैसे कि वाइरल न्यूमोनिया (Viral Pneumonia),  पेशीय शोथ (MYositis). Rhabdomyolysis Myocarditis, Encephalitis(मस्तिष्क ज्वर), फेफड़े एवं गुर्दे की खरीबी इत्यादि में  एन्टीवाइरल दवाओं जैसे कि Osceltamivir, Amantidine, Ribavirine  और Zanamivir  का भी कोई निश्चित प्रभाव नहीं है। सबसे सामान्य अन्य समस्याऍ जो H1N1 विषाणु से उत्पन्न होती है वो हैं Bacterial Pneumonia जैसे कि  Streptococcus (Gram Positive Cocci in pairs), Staphylococcus aureus (Gram positive in Clumps) & Hamophilus  influenza (Gram negative bacilli) में सभी जीवाणु जनित बीमारियां आज उपलब्ध एण्टीमाइक्रोबियल (एण्टीबायोटिक्स) दवाओं से ठीक किये  जा सकते हैं, जो 1970 – 80 के दशक में अथवा उससे पहले उपलब्ध नहीं थे। अतः जीवाणु जनित निमोनिया का उपचार पहले की अपेक्षा आज बहुत आसान हो गया है। नयी तकनीकियों की वजह से आजकल बीमारियों की जॉच भी आसानी से और शीघ्रता से हो जाता है। जैसा कि RT PCR (Reverse Transcriptase Polymerase chain Reaction) done by PCR machine,  अन्य जाचे जैसे कि H1N1, ELISA, Compliment fixation, Chest X-ray, बलगम की जॉच , जीवाणु जनित रोगों के लिए Gram Staining, Culture और Sensitivity test. ऐसे व्यक्ति जिनमें स्वाइन फ्लू होने का खतरा अधिक होता है जैसे बच्चों में वृध्द व्तक्ति (64 वर्ष से अधिक उम्र), मधुमेह के मरीज, गुर्दे के मरीज, अस्थमा के मरीज, HIV  के मरीज, गर्भवती महिलाये, नशा करने वाले व्यक्तियों और अस्पताल कर्मचारीओं को विशेष सावधानियॉ बरतनी चाहिए जैसे कि उनहें भीड़ – भाड़ वाले इलाके से दूर रहना चाहिए, बुखार व सॉस लेने की तकलीफ होते ही ऑक्सीजन और Haemodynamic Support उपलब्ध होना चाहिए। इस विषाणु में 13 प्रकार के  ‘H’  एण्टीजन और 9 प्रकार के ‘N’ एण्टीजन होते हैं जो 117 प्रकार के संभव विषाणु प्रकार बना सकते है और इतने विभिन्न प्रकार के एण्टीजन के खिलाफ टीका बनाना वस्तुतः असंभव है।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि इलाज करने से बेहतर परहेज करना। अतः कुछ सामान्य सावधानियॉ अपनाकर जैसे हाथ धोना, अति संवेदनशील स्थानों(अस्पताल, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशन) पर मास्क पहनना, खॉसते एवं छींकते समय मुह पर रुमाल रखना, अच्छी तरह पका हुआ सुअर का मॉस खाना, आराम करना, पानी पीना और बीमार व्यक्ति को अलग रखकर हम स्वाइन फ्लू के सामान्य मगर जानलेवा कहे जाने वाले रोग से बच सकते है।
क्या करे :-
1. यह जाने कि स्वाइन फ्लू ज्यादातर साधारण बीमारी है तो सामान्य दवायें (अपने डाक्टर की सलाह से) व सामान्य परहेज से 2 – 5 दिनों में ठीक हो जाती है।
2. बिमारी होने पे तीन (Triad) साधारण बातें ध्यान दें।(बीमारी होने पे)
3. बाहर से घर में आने पर साबुन से हाथ 20 – 30 सेकेण्ड जरुर धोयें।
4. रिस्क ग्रुप जो ऊपर लिखें हैं सॉस में समस्या होने पर, सीने में भारी पन होने पे, बच्चों पे शरीर का कोई भाग नीला पड़ने पर अस्पताल में तुरन्त भर्ती करायें जहाँ Oxygen देने की सुविधायें हों।
5. सुअर का ठीक से पका मॉस स्वाईन फ्लू नहीं फैलाता। इसलिए सुअर को न मारें।
6. स्वाइन फ्लू की जांच सब मरीजों में कराने की भी आवश्यकता नहीं है। कुछ Risky लोगों व कुछ मेडिकल समस्याओं में ही जांच की जरुरत पड़ती है। इसलिए जांच कराने के लिए लाइनों में न खड़े  हो  क्योंकि इसके विषाणु 2- 3 फिट के दायरे में संक्रमण कर सकते हैं।
7. स्कूलों में अगर कोई बच्चा फ्लू जैसे लक्षण लेकर आये तो उसके अभिभावकों को बुलाकर तुरन्त उसे घर भेज दें।
8. स्वाइन फ्लू का मरीज अपने स्कूल व ऑफिस 7 – 10 दिन बाद ही जायें।
9. मुँह पे कपड़ा रखकर ही खांसे व छीकें।
क्या न करें :-
1. बीमारी से व डरें।
2. इस बीमारी के विषय में भ्रान्तियां न फैलायें ।
3. अनावश्यक जांच न करायें।
4. टैमीफ्लू का भी असर कुछ हद तक सीमित है इसलिए जबरदस्ती इस दवा के पीछे न भागें (केवल सरकारी डॉक्टर की सलाह से ही अस्पताल में प्राप्त करें)
5. एस्प्रीन जैसी दवा का इस बीमारी में इस्तमाल बिल्कुल न करें।
6. H1N1 से पिछले सालों में मरने वालों की संख्या की तुलना इस साल से न करें क्योंकि अब हमारे पास बहुत सारी अच्छी दवायें हैं।
7. जबरदस्ती मास्क न पहने क्योंकि आम सर्जिकल मास्क  स्वाईन फ्लू से बचाव के लिए पूरी तरह कारगर नहीं है बल्कि ज्यादा पहले से इस मास्क पर हमारी सॉस की नमी इस मास्क को हल्का गीला कर देती है व फ्लू वायरस होने की सम्भावनायें पहले से बढ़ जाती है।
8. जो मास्क स्वाईन फ्लू से बचाता है वह एक विशेष मास्क हैं जिसे N-95  कहते हैं उसे भी केवल डाक्टरों व पैरामैडिक स्टाफ द्वारा पहना जाता है। साधारण जनता द्वारा नहीं अन्यथा इसके पहनने से हमारे फेफड़ों पर जबरदस्ती ज्यादा जोर पड़ता है।

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